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  • August 7, 2016
keshav-maurya

Image Credit: www.legendnews.in

Uttar pradesh में अगले साल चुनाव हैं. बॉलीवुड मसाला से भरपूर दिखने वाले ये चुनाव उत्सुकता भरने वाले हैं. शुरुआती ओपिनियल पोल के मुताबिक, बसपा पहलेनंबरपर, बीजेपी दुसरेऔरसपातीसरे पायदान पर नजर आ रही है. बीजेपी मुख्यमंत्री उम्मीदवार के नाम का ऐलान करने या न करने से गुजर रही है. सपा और बसपा इस मामले में ‘दबावमुक्त’ है.

असम में बीजेपी को ‘क्लीयर लीडरशीप’ से फायदा मिला है. हालांकि, सभी चुनाव अलग तरह से होते हैं और ये जरूरी नहीं कि एक राज्य में सफलता दिलाने वाला फॉर्मूला दूसरे राज्य में भी सफलता दिलाए. पार्टी में फैली तमाम कंफ्यूजन और ओपिनियन पोल्स के बावजूद यूपी चुनाव में बीजेपी के अच्छी संभावनाएं हैं.

इन 11 वजहों से बाकियों से आगे है बीजेपी:

1. केंद्र में मोदी सरकार की अच्छी परफॉर्मेंस
मई 2016 में मोदी सरकार ने दो साल पूरे किए. लोकप्रियता के मामले में मोदी अब भी सारेसर्वे में ऊपर है. ऐसे में अगर लोकसभाचुनाव होते हैं, तो बीजेपी 2014 जैसी जीत दोहरा सकती है. भ्रष्टाचार में नियंत्रण, कम महंगाई, ऊंची आर्थिक विकास दर और भारत की ब्रांड इमेज बढ़ने को मोदी की उपलब्धियों के तौर पर गिना जा सकता है.

हालांकि अब भी बहुत काम किया जाना बाकी है. लेकिन आलोचकों का एक पलड़ा ये भी मानता है कि मोदी को ज्यादा वक्त दिए जाने की जरूरत है. मोदी शासनकाल का 60 फीसदी वक्त अब भी बाकी है. मोदी की 2 साल की खूबियों को बीजेपी यूपी में समाजवादी पार्टी के 5 साल के कुशासन के मुकाबले में गिनवाएगी. बीजेपी शासित राज्य मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात और छत्तीसगढ़ में सरकार की फरफॉर्मेंस की तुलना यूपी सरकार से की जाएगी.

2. अखिलेश के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर
अखिलेश सरकार सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रही है. ओपिनियन पोल भी ये संकेत देते हैं कि राज्य के लोग बदलाव चाहते हैं. खराब कानून व्यवस्था (मथुरा जवाहर बाग हिंसा), निम्न विकास दर और अपनी ही अथॉरिटी से मुख्यमंत्री के मतभेद से लोग नाखुश हैं.

अखिलेश के शासन में राज्य की जीडीपी बीते दो साल में औसत राष्ट्रीय जीडीपी से ज्यादा है. आगरा-नई दिल्ली यमुना एक्सप्रेस-वे को छोड़ दिया जाए, तो जमीन पर ज्यादा बदलाव नजर नहीं आता है. अखिलेश सरकार के विज्ञापन विकास कार्यों को बताने में नाकाम रहे हैं. लखनऊ मेट्रो प्रोजेक्ट, आगरा लखनऊ एक्सप्रेस-वे जैसे प्रोजेक्ट जिस तरह से शुरू किए गए, लेकिन चुनाव से पहले इनका ‘सियासी फायदा’ लेने में भी अखिलेश सरकार लेट साबित हो रही है.

3. चरमराती कानून व्यवस्था
graph of law and order in UP

यूपी में अखिलेश सरकार के आने के बाद अपराध की घटनाएं बढ़ी हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, एक लाख की जनसंख्या में 2011 में जहां अपराध की दर98 था, वहीं 2014 में ये बढ़कर 113 हो गया है. मर्डर, रेप, अपहरण, दंगे के मामलों में बढ़ोतरी हुई है. सपा के 47 फीसदी विधायकों का आपराधिक रिकॉर्ड है.

4. प्रदेश में पांच सीएम (5 मुख्यमंत्री) से confusion
उत्तर प्रदेश में ये बात कही जाती है कि राज्य में पंच मुख्यमंत्री हैं. मुलायम सिंह यादव, शिवपाल, रामगोपाल, आजम खां और अखिलेश यादव को राज्य के पांच मुख्यमंत्रियों में गिना जाता है. 2012 में सपा की जीत के बाद मुलायम के छोटे भाई शिवपाल यादव, सीएम के लिए अखिलेश को चुने जाने और खुद को साइड किए जाने से नाराजथे.

सपा के वरिष्ठ लीडर राज्य में समानांतर सरकार चला रहे हैं. कई मौकों पर इन लीडर्स ने अखिलेश सरकार की खुलेआम आलोचना भी की है. जिससे वोटर्स इस बात को असमंजस में रहे कि फाइनल अथॉरिटी आखिर किसके पास है?

5. बीजेपी के पास सबसे बड़ा समाजिक गठजोड़
बीजेपी के पास बड़े जातीय वोटबैंक हैं, जिसमें अपरकास्ट (17 फीसदी), ओबीसी (यादवों के अलावा 33 फीसदी), जाट (2 फीसदी) और दलित (जाटवों के अलावा 9 फीसदी) शामिल हैं. ये जनसंख्या के 61 फीसदी लोग हैं. इस लिहाज से मुलायम और मायावती के समाजिक गठजोड़ कम मजबूत हैं.

मायावती के वोटबैंक में दलित, मुस्लिम और ब्राह्मण (जनसंख्या का 49 फीसदी) है. मुलायम के वोट बैंक में यादव, ओबीसी का एक सेक्शन और मुस्लिम (जनसंख्या का 50-55 फीसदी) है.

बीते लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने यादव और जाटव वोटबैंक में सेंध लगाई है. ऐसे में मोदी के विकास एजेंडे को आगे रखकर इस वोटबैंक केयुवावर्गको बीजेपी प्रभाव में ले सकती है.

6. वोट शेयर की शुरुआती बढ़त

graph of vote share in UPलोकसभा 2014 चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 42.6 फीसदी रहा. आम चुनावों के बाद जिन 10 राज्यों में बीजेपी ने चुनाव लड़ा है, वहां औसतन उसे 20 फीसदी वोटों का नुकसान झेलना पड़ा है. सिर्फ महाराष्ट्र और केरल में बीजेपी का वोट शेयर बढ़ा है. सबसे खराब स्थिति पश्चिम बंगाल की रही, जहां बीजेपी को 40 फीसदी से ज्यादा वोट का नुकसान हुआ. अगर हम ये मान लेते हैं कि बीजेपी को बंगाल की तरह 40 फीसदी वोट का नुकसान होता है, तो भी बीजेपी का वोट शेयर करीब 26 फीसदी होगा, जो कि सपा और बसपा के लोकसभा चुनाव में पाए वोट शेयर से ज्यादा है.

 

7. दलित और मुस्लिम वोटों का बंटना

मुस्लिम और दलितों का वोट शेयर राज्य में 40 फीसदी है. मुस्लिम वोट सपा, कांग्रेस और बसपा में बंटे हैं. दलित वोट कांग्रेस-बसपा में बंटे हैं. सपा, बसपा और कांग्रेस अल्पसंख्यकों को लुभाती रही है. कयास है कि बसपा 100 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दे सकती है. दूसरी तरफ कांग्रेस ने स्टेट की बागदोर गुलाम नबी आजाद को दी है. प्रशांत किशोर के दिमाग वाली कांग्रेस दलितों को लुभाने के लिए कदम उठा सकती है. ताकि अपना पारंपरिक वोट बैंक अपर कास्ट, दलित और मुस्लिमों में फिर से जान फूंक सकें.दलित और मुस्लिम वोटबैंक में जो स्प्लिट होगा उसका फायदा बीजेपी को मिलेगा.

8. यूपी में बिहार जैसा महागठबंधन नहीं है

बिहार की तरह यूपी में ओप्पोसिशन महागठबंधन बनाने में विफल रही है इसका फायदा बीजेपी को होगा क्योंकि एंटीबीजेपी वोट बंटेगा. बसपा और कांग्रेस अलायन्स बनाने में नाकाम  . चौतरफा मुकाबले में बीजेपी बाकी ओप्पोसिशन पार्टीज की आपसी लड़ाई में आगे निकल जाएगी.

9. बसपा के कुछ टॉप लीडर्स पार्टी छोड़ कर जा रहे हैं
हाल के दिनों में कुछ सीनियर लीडर्स स्वामीप्रसाद मौर्य, आरपीचौधरी, रविंद्रनाथ त्रिपाठी, बसपा छोड़कर जा चुके हैं उन्होंने मायावती पर टिकट बेचने का आरोप लगाया है। हम ऐसे एरा में हैं जहाँ चुनाव में परसेप्शन बड़ा फैक्टर है यह वारदात युवा वोटर्स को बसपा से दूर कर सकती है और पार्टी की छवि खराब कर सकती है।

10. दयाशंकर एपिसोड को यूज़ करने में बीजेपी सफल रही है
दयाशंकर एपिसोड से यह लगा कि बीजेपी को अन्य दलितों के वोट्स का नुक्सान होगा और यह हुआ भी है। बीजेपी जिसे ४५ फीसदी गैर जाटव वोट मिले थे लोकसभा में. उसके लिए यह परफॉरमेंस दोहराना मुश्किल होगा। कुलमिला कर २-३ फीसदी वोट शेयर बीजेपी को नुकसान हुआ यह एपिसोड से.

लेकिन बसपा के दयाशंकर के फॅमिली अटैक की वजह से अपरकास्ट वोटर्स मायावती से नाराज हैं। बसपा को भी २ ३ फीसदी वोट्स का नुक्सान हुआ। कुलमिला कर गेम बराबर।

11.यूपी ने हमेशा सरप्राइज रिजल्ट दिया है
बीते दशक में यूपी ने वो परिणाम दिए हैं, जो आमजनधारणा से विपरीत थे.

a. 2004 लोकसभा चुनाव में जब वाजपेयी सरकार की अच्छी परफॉर्मेंस के चर्चे हर तरफ थे, उस दौर में बीजेपी के यूपी में कमाल करने की उम्मीदें थीं. लेकिन उस चुनाव में सपा ने सबसे ज्यादा सीटें बंटोरीं.

b. 2007 विधानसभा चुनाव में, जब हैंग असेंबली का अंदाजा था, तब बसपा बहुमत से जीती.

c. 2009 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और आरएलडी का गठबंधन था. यूपीए-1 की गरीबी हटाने वाली योजनाओं के दम पर आरएलडी 26 सीटें जीत सकी थी. ये वो चुनाव थे, जिसमें लोगों के इस पार्टी के खाता खुलने तक की उम्मीद नहीं थी.

d. 2012 विधानसभा चुनावों में फिर लोगों को साफ जनादेश की उम्मीद नहीं थी. लेकिन सपा ने बड़ी बढ़त के साथ चुनाव जीते और सत्ता हासिल की. कांग्रेस-आरएलडी की 2009 लोकसभा में मिली जीत का फायदा भी 2012 में देखने को मिला. सपा ने बसपा की 2007 की जीत से बड़ी जीत हासिल की.

e. 2014 लोकसभा चुनाव में सर्वे में एनडीए को 40-50 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया था. लेकिन अमित शाह ने राज्य की 80 में से 70 सीटें जिताकर बड़ा खेल कर दिखाया था.

अब जब ओपिनियन पोल और ट्रेंड्स बसपा को आगे बता रहे हैं, बीजेपी जीत हासिल कर सरप्राइज विनर के तौर पर सामने आ सकती है.
बसपा भले ही ट्रेंड्स में आगे दिख रही है. पर मेरे ओपिनियन और ऊपर लिखे फैक्टस के हिसाब से बीजेपी यूपी चुनाव में फ्रंट रनरअप बन सकती है. छोटी पार्टियों के साथ गठजोड़, सीएम उम्मीदवार को चुने जाने को लेकर किए फैसले और सीटों के उम्मीदवारों को चुना जाना जीत दिलाने में जरूरी कारक हो सकते हैं. दलितों और मुस्लिमों के वोट का ध्रुवीकरण और बसपा कांग्रेस में गठजोड़ बीजेपी की जीत को रिस्क में डाल सकता है.

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