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  • December 26, 2016
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Image credit: www.legendnews.in

समाजवादी पार्टी में चल रहे घमासान, बहुजन समाज पार्टी (BSP) के नेताओं के लगातार दल बदलने और ओपिनियन पोल में कांग्रेस के कमजोर प्रदर्शन ने यूपी में बीजेपी से टक्कर लेने के लिए महागठबंधन के आसार बढ़ा दिए हैं. उरी आतंकी हमले और सर्जिकल स्ट्राइक के बाद बीजेपी ने प्रदेश के वोट बैंक में तेजी से सेंध लगाई है.

यूपी में चल रही सियासी उठापटक के बीच जो कांग्रेस बीते 25 साल से चौथी नंबर पर है, वह एक बार फिर सबसे हॉट प्रॉपर्टी की तरह उभरी है. एक तरफ सपा के दोनों धड़े कांग्रेस के साथ गठबंधन चाहते हैं तो दूसरी ओर बीएसपी-कांग्रेस का गठबंधन यूपी के चुनावी माहौल में बड़ा बदलाव ला सकता है.

बिहार के जैसा महागठबंधन
यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी में छिड़ी लड़ाई के बाद गठबंधन को लेकर कांग्रेस के पाले में गेंद डाल दी है. राहुल गांधी और अखिलेश यादव को लेकर कहा जा रहा है कि दोनों के बीच अच्छे समीकरण बन सकते हैं.

शिवपाल यादव ने जेडीयू नेताओं से बात की है और यह भी कहा जा रहा है कि शरद यादव ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से भी महागठबंधन का हिस्सा बनने को लेकर बात की है.

माना जा रहा है कि लगभग खत्म हो चुकी गठबंधन की संभावनाओं के बाद एक बार फिर बीएसपी-कांग्रेस के साथ आने को लेकर बैक स्टेज से बातचीत शुरू हो गई है. बीएसपी 75 से 100 सीटें कांग्रेस को ऑफर कर सकती है जो कि पार्टी के लिए एक अच्छा सौदा होगा.

कांग्रेस को मौका
यूपी में कांग्रेस की उपस्थिति बेहद कम है और बीते तीन महीनों में किए गए ओपिनियन पोल बताते हैं कि यहां पार्टी का वोट शेयर करीब 6 फीसदी है. वोट प्रतिशत कम होने के पीछे वजह यह मानी जा सकती है कि वोटर कांग्रेस को यूपी के महाभारत में असरदार खिलाड़ी नहीं मानते. हालांकि-

1. चौथे नंबर को ध्यान में रखते हुए 6 से 8 फीसदी वोट बैंक मुश्किल
ओपिनियन पोल बताते हैं कि बीजेपी प्रदेश में 30-32 फीसदी वोट शेयर के साथ सबसे आगे है जबकि बीएसपी और सपा दोनों 25-28 फीसदी वोट के साथ जंग लड़ती दिख रही हैं. दूसरी ओर खड़ी कांग्रेस अपने वोटों से उस पार्टी का पलड़ा भारी कर सकती है जिसके साथ उसका गठबंधन होगा. अगर ऐसा हुआ तो बीजेपी के पीछे छूटने की संभावनाएं ज्यादा हैं.

2. तीन मुख्य वोट बैंक के बीच कांग्रेस का असर
यूपी के तीन प्रमुख वोट बैंक मुस्लिम, दलित और ब्राह्मण हैं. इनके बीच कांग्रेस का खासा असर है. बीते पांच चुनावों में कांग्रेस को मुस्लिमों के औसतन 16 फीसदी, ब्राह्मणों के 20 फीसदी और अनुसूचित जाति (नॉन जाट) के 10 फीसदी वोट मिले हैं. अगर कांग्रेस इन तीनों वोट बैंक से इतने ही वोट फिर हासिल कर लेती है तो वह 6 फीसदी वोट शेयर का आंकड़ा आराम से छू जाएगी.

3. अल्पसंख्यक वोट बैंक को एकजुट करना
प्रदेश की आबादी में करीब 20 फीसदी मुस्लिम हैं. यह वोट बैंक सीधे तौर पर एंटी-बीजेपी माना जाता है जो कि आसानी से सपा और बीएसपी की ओर झुक सकता है. कांग्रेस का मुस्लिम वोट बैंक कुल 3 फीसदी है जो कि आने वाले चुनावों में काफी अहम है. कांग्रेस की बेस्ट परफॉर्मेंस 2009 के लोकसभा चुनावों में दिखी थी, जब उसे 25 फीसदी मुस्लिम वोट मिले थे.

निर्णायक फैक्टर
यूपी चुनावों में मुस्लिम वोट 73 सीटों के रिजल्ट पर खासा असर रखते हैं जहां उनकी आबादी 30 फीसदी से ज्यादा है. जबकि सपा को इस समुदाय का समर्थन पारंपरिक रूप से मिलता रहा है. 2002 में 54 फीसदी वोट शेयर के मुकाबले 2012 में 39 फीसदी रहे वोट शेयर से सपा को बड़ा झटका लगा था लेकिन 2014 लोकसभा चुनावों में पार्टी ने एक बार फिर 58 फीसदी वोट हासिल करने के साथ मुस्लिमों के बीच भरोसा भी कायम कर लिया. जबकि 2012 में बीएसपी का मुस्लिम वोट प्रतिशत 20 फीसदी था. जो कि 2002 में सिर्फ 9 फीसदी था.

माना जा रहा है कि मुस्लिम उस पार्टी के साथ खड़े होंगे जिसमें बीजेपी को हराने का दम हो और सपा उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकती. किसी भी पार्टी के साथ कांग्रेस का गठबंधन इस वोट बैंक के सहारे उसे बीजेपी के मुकाबले बड़ी पार्टी बनने में मदद करेगा.

सपा का गणित है कि कांग्रेस और कौमी एकता दल उसकी तरफ हैं जो मुस्लिम वोट बैंक को एकजुट करता है और करीब 30 फीसदी मुस्लिम यादव वोट बैंक को साथ लाने में सक्षम है. कांग्रेस की मदद से यह वोट बैंक पूरी तरह कहीं और जाने से रोका जा सकता है.

मेरा मानना है कि कांग्रेस का वोट बैंक 50-75 सीटों पर मजबूत है जहां वह सपा या बीएसपी के साथ गठबंधन करके और बेहतर प्रदर्शन कर सकती है. 200 से ज्यादा सीटें जीतकर सरकार बनाने की स्थिति में एक पार्टी 50 से ज्यादा सीटें जीतकर बेहद महत्वपूर्ण बन जाती है.

वोटों का ट्रांसफर भी एक रास्ता
बीते समय में बीएसपी ने कांग्रेस की वोट ट्रांसफर करने क्षमता को लेकर सवाल उठाए थे. मायावती को लगता है किसी भी तरह के गठबंधन से ज्यादा फायदा कांग्रेस को होगा न कि बीएसपी को. 1996 में जब बीएसपी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था तो कांग्रेस का वोट प्रतिशत 1993 में रहे 15 फीसदी के मुकाबले दोगुना होकर 29.1 फीसदी हो गया था, जबकि बीएसपी का वोट प्रतिशत 28.7 से घटकर 27.7 फीसदी हो गया था.

अगर बिहार, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के बीते चुनावों की बात करें तो यह साफ दिखा कि जब भी कांग्रेस जीत दर्ज करने वाले गठबंधन का हिस्सा रही है, उसका वोट प्रतिशत बढ़ा है. बीते चुनावों को को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि अगर यूपी सपा-कांग्रेस या बीएसपी-कांग्रेस का गठबंधन होता है तो वोटों के ट्रांसफर का मुद्दा भी पार्टी की मजबूती का अहम कारण बन सकता है.

सपा की ओर बढ़ा झुकाव?
कांग्रेस के चुनाव प्रचार की रणनीति देख रहे प्रशांत किशोर इस चुनाव में सपा के पक्ष में माहौल खड़ा कर सकते हैं. सपा में मचे घमासान से मामले में पेंच आ सकता है लेकिन राहुल गांधी यहां गठबंधन को लेकर निर्णायक की भूमिका निभा सकते हैं. वोट बैंक और ‘एम’ फैक्टर को ध्यान में रखते हुए अखिलेश यादव भी पार्टी के विभाजन को लेकर चौकन्ने होंगे. प्रदेश का युवा वोटर अखिलेश यादव को विकास का चैंपियन मानता है जबकि मुस्लिमों का बड़ा तबका मुलायम के साथ ही रह सकता है.

सपा या बीएसपी के साथ कांग्रेस के गठबंधन की स्थिति में प्रियंका गांधी को प्रचार के लिए उतारने का फायदा गठबंधन को मिलेगा. प्रियंका की वजह से न्यूट्रल वोट बैंक गठबंधन के साथ जुड़ सकता है. इससे गठबंधन को 1-2 फीसदी वोट ज्यादा मिलेगा जो असरदार होग

Comments

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