• mohd.shakib@smanik.com
  • November 16, 2016
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This article was originally published in Legendnews.

उत्तर प्रदेश चुनाव बीजेपी के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं. हिंदीभाषी बिहार में हार के बाद बीजेपी और उसके समर्थकों को अब यूपी चुनाव से उम्मीदें हैं. लखनऊ की सत्ता पाने में अगर बीजेपी को हार मिलती है, तो इससे ‘मोदी हटाओ’ कैंपेन को जोर मिलेगा.

विश्लेषकों और समर्थक के बीच फिलहाल इस बात को लेकर चर्चा हो रही है कि क्या बीजेपी को सीएम उम्मीदवार के नाम का ऐलान करना चाहिए या नहीं? यूपी में मायावती और अखिलेश यादव की टक्कर में बीजेपी के लिए ये बेहद जरूरी है कि वो मजबूत दावेदार ही मैदान में उतारे. असम में सीएम उम्मीदवार के नाम का ऐलान करके बीजेपी इस रणनीति का फायदा देख चुकी है.

2011 के बाद के राज्य चुनावों को देखा जाए, तो हमारा अनुभव ये बताता है कि मजबूत सीएम उम्मीदवार का ऐलान चुनावी रिजल्ट के लिए फायदे का सौदा रहता है. 2016 पश्चिम बंगाल के चुनाव की बात करें तो मार्च में हुए सर्वे में ये कहा गया कि बीजेपी और कांग्रेस के वोटर्स ममता दीदी की पाले में जा सकते हैं. इसकी एक वजह लीडरशीप के मामले में दूर तक सूर्यकांत मिश्रा का न दिखना रहा. लेकिन अगर तमिलनाडु की बात करें तो वहां नजदीकी मामला देखने को मिला. क्योंकि स्टालिन युवा वोटर्स और महिलाओं के बीच अच्छा काम कर रहे थे. ऐसे में अगर इस परिदृश्य को देखा जाए तो बीजेपी के लिए यूपी चुनाव में सीएम उम्मीदवार के नाम का ऐलान करना जरूरी हो जाता है.

पहले आइए यूपी को समझते हैं

यूपी में सीएम उम्मीदवार के नाम का ऐलान करने को लेकर ऊपर कई तर्क दिए गए हैं. लेकिन आइए पहले यूपी के राजनीतिक परिस्थितियों की बात कर ली जाए. नीचे दिए चार्ट में यूपी में बीते 6 चुनाव (लोकसभा+ राज्यसभा) के वोट शेयर को देख लिया जाए. इस ग्राफ का मकसद सिर्फ आपको ये बताना है कि यूपी में वोटिंग ग्रुप्स किस समुदाय को कितना वोट देते हैं, उनका क्या वोट शेयर है. इस ग्राफ से 2017 विधानसभा चुनाव को लेकर किसी तरह का अंदाजा लगाने की कोशिश न करें.

3 ट्रेंड्स, जो बेहद स्वाभाविक हैं

1- सपा का वोट बेस सबसे स्थिर है. 2012 में सपा का वोट शेयर करीब पुराने 22.3 से 3 फीसदी बढ़कर 26.7 पर पहुंचा. ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि यादव-मुस्लिमों वोटर्स के एक बड़े तबके ने समाजवादी पार्टी का समर्थन किया. पार्टी ठाकुरों, अन्य ओबीसी, दलितों का वोट पाने में सफल रही, इस तबके ने 2012 में अखिलेश के लिए वोट दिया. हालांकि सपा के अपने मुख्य वोट बैंक के अलावा दूसरे वोट बैंक को लुभाने की भी कुछ सीमाएं हैं. इसकी एक वजह यादवों और मुस्लिमों पर पार्टी की ज्यादा निर्भरता है, लेकिन इससे वोट शेयर में अस्थिरता पैदा होती है.

2. बसपा अपने 30 फीसदी वोट शेयर के पीक से नीचे उतरी है. 2014 लोकसभा चुनावों में बसपा का स्कोर 2002 के आंकड़े के पास पहुंचा था. बसपा का कोर वोट बैंक जाटव, सपा के मुस्लिम-यादव की जोड़े के मुकाबले छोटा पड़ जाता है. इसलिए बसपा को कई क्रॉस-कास्ट कॉम्बिनेशन (खासकर ब्राह्मण) बनाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी, जिसमें मुस्लिम, अन्य अनुसूचित जाति और कुछ EBCs को अपने पाले में लेना होगा. जाटव वोट बैंक को छोड़ दिया जाए तो सभी वोट ग्रुप्स को पार्टियां लुभाने में लगी हुई हैं. ऐसे में बसपा के लिए अपना वोट शेयर बचाए और बढ़ाना चुनौती बना हुआ है.

3. बसपा 2004 से वोट शेयर के मामले में नीचे की तरफ सरकी थी. लेकिन 2014 में बीजेपी ने यूपी में कमाल कर दिया. बीजेपी का अपरकास्ट वोट 2012 तक उससे हटता नजर आया. इस वोट बैंक के लोग विजेता और लुभाने के तरीकों के मद्देनजर बसपा और सपा की तरफ हो लिए, 2014 में खेल बदला. बीजेपी अपर कास्ट वोट बैंक पाने में सफल रही. इसके अलावा गैर जाटव एससी, नॉन यादव ओबीसी वोट (कुल वोट शेर का 35-40 फीसदी) भी बीजेपी को मिला. बीजेपी युवा जाटव वोट पाने में सफल रही थी. इससे सभी समुदायों का मिला जुला एक अस्थायी नया वोटिंग ब्लॉक बना, जिससे बसपा और सपा के लिए कुछ मामलों में चुनौती की स्थिति पैदा हुई. मोदी के विकास एजेंडे पर सवार होकर बीजेपी ने 2014 में काफी हद तक जाति आधारित राजनीति का खात्मा सा कर दिया.

2017 के यूपी चुनाव में बीजेपी की रणनीति के 3 आधार

ऊपर दिए परिदृश्य और अनुभव की मानें, तो यूपी में बीजेपी की रणनीति के तीन आधार हैं. बीजेपी इसी रणनीति के दम पर बसपा और सपा के कोर वोट के बाहर लुभाने की कोशिश करेगा. ये वोट बैंक आंकड़ों में 60 फीसदी है. बीजेपी की रणनीति के ये तीन आधार कुछ खास तबकों को लक्ष्य मानकर काम करेगी. इस रणनीति को अंजाम तक पहुंचाने के लिए नेताओं, संस्थाओं को जिम्मेदारी दी गई है.

  1. विकास और गुड गवर्नेंस

प्रधानमंत्री समेत कई राष्ट्रीय नेता गुजरात और केंद्र में मोदी के विकास ट्रैक को यूपी की जनता को चुनाव से पहले बेचेंगे. हाई जीडीपी ग्रोथ, कम महंगाई, रिकॉर्ड एफडीआई, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, रेलवे और हाईवे निर्माण, स्वच्छ भारत, जनधन योजना के चर्चों से यूपी को लुभाने की कोशिश की जाएगी. बीजेपी के टारगेट में वो यूथ रहेगा, जिसे नौकरी की तलाश है और वो तबका, जिसका शहर से ताल्लुक है. राज्य फिलहाल जीडीपी दर के लिहाज से देखा जाए तो विकास के मामले में पिछड़ा हुआ है. मोदी इसी राज्य की जनता को सपने दिखाने का काम करेंगे. साथ ही, केंद्र की बीजेपी सरकार की रेटिंग से भी यूपी में बीजेपी को फायदा मिलेगा.

  1. कई जातियों को एक छतरी के नीचे लाएगी बीजेपी

2014 में यूपी की जनता ने जाति की महत्वता को भूल विकास के नाम पर वोट दिया. जातीय राजनीति 2014 में काम नहीं कर पाई. ये किसी से छिपा नहीं है कि यूपी में लोग जाति के मद्देनजर अपना नेता चुनते हैं. जाटवों का बड़ा तबका मायावती और यादव मुलायम सिंह को चुनता है. 2014 में भी इस सच को झुठलाया नहीं जा सका.

अमित शाह, ओम माथुर और कई क्षेत्रीय नेता इस रणनीति के लिए जिम्मेदार हैं. किसी जाति में अपनी पैठ रखने वाली छोटी पार्टियों से गठजोड़ बीजेपी करेगी. अपना दल, भारत समाज पार्टी ताजा उदाहरण हैं. इस रणनीति का उद्देश्य ग्रामीण इलाकों के अपर कास्ट वोट के अलावा ओबीसी वोटर्स के छोटे ग्रुप्स को अपने पाले में लेना है.

  1. हिंदू वोटों का जमावड़ा

इसे बीजेपी की जीत की चाबी समझिए. महेश शर्मा, योगी आदित्यनाथ का इस्तेमाल इस रणनीति के लिए किया जाएगा. बीफ मर्डर केस लौट चुका है और इस रणनीति के लिए ये प्रोत्साहन का काम करेगा. अल्पसंख्यक समुदाय के ध्रुवीकरण की सपा की कोई भी कोशिश इस रणनीति के लिए फायदेमंद साबित होगी. इसके अलावा सुब्रमण्यम स्वामी राम मंदिर मुद्दे पर टांग लटकाए जमे ही हुए हैं. हालांकि इस मुद्दे को कौन उठाएगा, ये बहस का विषय है. राम मंदिर के अहम विषय है, जिसका ताल्लुक अयोध्या बेल्ट की 73 सीटों से है. ऐसे में मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंदू वोटों के एकजुट होने से बीजेपी को फायदा मिलने के  अलावा सपा और बसपा का वोट खीचने में भी बीजेपी सफल साबित हो सकती है.

2014 की तरह ही इन रणनीतियों के सफलतापूर्वक लागू करने के लिए बीजेपी को 2017 में भी एक लीडर की जरूरत होगी. ताकि इन तीन आधार को नेतृत्व करने के लिए एक नेता हो. 2014 में मोदी ने ये काम करके ऐतिहासिक जीत हासिल की. यूपी में फिलहाल कोई भी ऐसा नेता नहीं है, जो ये काम सफलतापूर्वक कर सके. पर हां, वरुण गांधी और स्मृति ईरानी इस पैमाने में काफी हद तक खरे नजर आते हैं. इन दोनों का नाम भी सोशल मीडिया में सबसे ज्यादा नजर आता है.  हालांकि इन तीन आधार को रिप्रेजेंट कर रहे नेताओं से इतर इन्हें बेहतर काम मिल सकता है, क्योंकि इस रणनीति की जिम्मेदारी बड़े रिस्क के साथ आती है. हालांकि अभी तक वरुण गांधी की समझ और अनुभव बीजेपी की नैया पार लगाएगी, इसको लेकर असमंजस की स्थिति है. वरुण गांधी के पास गवर्नेंस का कोई अनुभव नहीं है. वहीं, स्मृति ईरानी पर ‘बाहरी’ होने का ठप्पा लगा हुआ है.

क्या लीडर का ऐलान न करना खतरनाक है?

रिस्क बिहार के मुकाबले कम है. 2015 में जब बीजेपी नीतीश कुमार के खिलाफ लड़ी, तब नीतीश को 60 फीसदी सेटिसफेक्शन रेटिंग मिली. मायावती और अखिलेश ऐसी रेटिंग कभी नहीं हासिल कर पाए. नीतीश को सम्मान मिलने के साथ सत्ता विरोधी लहर का सामना भी नहीं करना पड़ा. 50 फीसदी सेटेसिफेकशन रेटिंग पाने के बावजूद कास्ट बेस से इतर बड़ी संख्या में वोटरों को अपने पाले में नहीं कर पाएंगे. इसकी एक वजह इन वोटर्स को पहले से ही बीजेपी की रणनीति के 3 आधार के जरिए बेहतर ऑफर मिलना है. इसके अलावा अखिलेश को खराब कानून व्यवस्था, बदतर विकास के चलते भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.

विद्रोही और करिश्माई मायावती को कमजोर वोट बेस और हाल के दिनों में दी खराब परफॉर्मेंस के चलते सावधानी से काम लेना होगा. हालांकि मायावती के गठबंधन को लेकर विवाद नहीं है. लेकिन उनकी पार्टी का कोर वोट बैंक समाजवादी पार्टी के मुकाबले काफी छोटा है. हालांकि बीजेपी की रणनीति का तीसरा आधार  अल्पसंख्यकों को एकजुट किए जाने का काउंटर माना जा सकता है. शुरुआती पोल्स में बसपा पहले नंबर और बीजेपी दूसरे पायदान पर नजर आ रही है. अगर बसपा को ये वोट मिल जाते हैं तो बीजेपी और बसपा गठबंधन के बीच गैप 2014 चुनावों के मुकाबले काफी कम होगा. इसी रणनीति पर चलते हुए मायावती ने अल्पसंख्यकों और आर्थिक रूप से पिछड़े लोग, जिनमें अपरकास्ट भी शामिल हैं, के लिए आरक्षण की मांग की है.

इस  पूरे पैक में सिर्फ एक जोकर कांग्रेस पार्टी है. ये अभी तक साफ नहीं है कि प्रशांत किशोर की रणनीति साल के आखिर तक कैसे काम करेगी. लेकिन एक बात जो क्लीयर है वो ये कि कांग्रेस किस पार्टी के साथ गठबंधन कर सकती है, संभवत: बसपा. हालांकि कांग्रेस के वोटर्स सपा और बसपा की तरफ जा सकते हैं, जैसा कि बंगाल समेत बीते कुछ चुनाव में देखने को मिला. लेकिन बीजेपी प्रशांत किशोर के ब्राह्मण वोटर्स को लुभाने के तरीके को भाप चुकी है. ब्राह्मणों का एक तबका बीजेपी के ओबीसी और दलितों को लुभाने की बात से नाराज है. बसपा अपर कास्ट को आरक्षण दिए जाने की बात करने लगी है. इससे बीजेपी को नुकसान होगा, साथ ही लीडर न चुने जाना इस बात का समाधान नहीं करेगा.

ऐसे में बीजेपी के लिए सबसे बढ़िया समाधान बीजेपी की रणनीति के 3 आधार पर ध्यान लगाना रहेगा. इस रणनीति के लिए नेताओं को सही चुनाव भी फायदेमंद होगा. ये तरीके 2017 में बीजेपी को जीत दिलाने के साथ यूपी की सत्ता बीजेपी को  दिलाने का रास्ता साफ कर देगी.

 

Comments

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